समन के स्थान पर वारंट कब जारी होता है
BNSS 2023 धारा 90 किया है हिन्दी में
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 90 में किसी भी मामले में किसी भी उपस्थिति के लिए समन जारी करने का अधिकार है ,लिखित रूप में अपने कारण दर्ज करने के बाद उसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर सकता है ।
a . यदि या तो ऐसे समन जारी होने से पहले , या उसके जारी होने के बाद , लेकिन उसकी उपस्थिति के लिए तय समय से पहले अदालत को यह विश्वास करने का कारण दिखाता है कि वह भाग गया है या समन का पालन नही करेगा।
b. यदि ऐसे समय में वह उपस्थित होने में असफल रहता है और साबित हो जाता है कि समन को उसके अनुसार उपस्थित होने कि अनुमति देने के लिए समय पर विधिवत् तामील कर दिया गया है और ऐसी विफलता के लिए कोई उचित बहाना नही दिया गया है ।
धारा 90 BNSS हिन्दी में/आसान भाषा में
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक आरोपी, गवाह या संबंधित व्यक्ति समय पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो, ताकि न्यायिक प्रक्रिया बिना किसी बाधा के सुचारु रूप से संचालित हो सके। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में समन (Summons) और वारंट (Warrant) जैसे कानूनी साधनों का प्रावधान किया गया है। इन प्रावधानों में धारा 90 BNSS एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह आवश्यक परिस्थितियों में समन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त वारंट जारी कर सके। सामान्यतः न्यायालय पहले समन जारी करता है, जो एक लिखित आदेश होता है और जिसके माध्यम से संबंधित व्यक्ति को अदालत में उपस्थित होने के लिए सूचित किया जाता है। यह एक अपेक्षाकृत सरल और कम कठोर प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति को स्वेच्छा से उपस्थित होने का अवसर दिया जाता है। परंतु कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जब यह प्रतीत होता है कि संबंधित व्यक्ति समन का पालन नहीं करेगा, या उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अधिक कठोर उपाय आवश्यक हैं, तब धारा 90 के अंतर्गत न्यायालय वारंट जारी करने का निर्णय ले सकता है।
न्यायालय कब समन के साथ वारंट भेज सकता है
धारा 90 के अनुसार, न्यायालय को यह विश्वास हो जाए कि केवल समन भेजना पर्याप्त नहीं होगा और व्यक्ति अदालत में उपस्थित नहीं होगा, तो वह सीधे वारंट जारी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय यह भी कर सकता है कि वह समन के साथ-साथ वारंट भी जारी कर दे, ताकि यदि व्यक्ति समन का पालन न करे, तो वारंट के माध्यम से उसकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके। यह प्रावधान न्यायालय को लचीलापन प्रदान करता है और उसे परिस्थितियों के अनुसार उचित निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है।
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उदाहरण
यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह जानकारी हो कि वह बार-बार अदालत के आदेशों की अवहेलना करता रहा है या उसके फरार होने की संभावना है, तो न्यायालय सीधे वारंट जारी कर सकता है। इसी प्रकार, यदि कोई मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है, जैसे हत्या, डकैती या अन्य संगीन अपराध, तो भी न्यायालय समन की प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे वारंट जारी कर सकता है, ताकि आरोपी को तुरंत हिरासत में लेकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
वारंट भी दो प्रकार के होते हैं—
जमानती वारंट (Bailable Warrant) और गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant)। जमानती वारंट अपेक्षाकृत कम गंभीर मामलों में जारी किया जाता है, जिसमें आरोपी को यह सुविधा दी जाती है कि वह निर्धारित शर्तों के अंतर्गत जमानत प्राप्त कर सकता है और उसे हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत, गैर-जमानती वारंट अधिक गंभीर मामलों में जारी किया जाता है, जिसमें आरोपी को तुरंत जमानत नहीं मिलती और उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। धारा 90 के अंतर्गत न्यायालय इन दोनों प्रकार के वारंटों में से किसी का भी चयन कर सकता है, यह पूरी तरह से मामले की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
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धारा 90 का प्रयोग करते समय न्यायालय को अपने विवेकाधिकार (Discretion) का प्रयोग अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ करना होता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वारंट जारी करना एक कठोर कदम है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करता है, इसलिए इसे केवल तब ही अपनाया जाना चाहिए जब यह वास्तव में आवश्यक हो। न्यायालयों ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि वारंट को अंतिम उपाय (Last Resort) के रूप में ही उपयोग किया जाना चाहिए और सामान्यतः पहले समन जारी किया जाना चाहिए। हालांकि, यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि समन से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती, तो न्यायालय सीधे वारंट जारी करने के लिए स्वतंत्र है।
इसके अलावा, धारा 90 का प्रयोग करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना भी आवश्यक है। इसमें निष्पक्षता, समानता और उचित प्रक्रिया का पालन शामिल है। न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय न हो और उसके अधिकारों का अनावश्यक हनन न किया जाए। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को समन प्राप्त ही नहीं हुआ और वह इसलिए उपस्थित नहीं हो पाया, तो सीधे वारंट जारी करना अनुचित माना जा सकता है। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति उचित कारणों से अनुपस्थित रहा हो, तो न्यायालय को उसके कारणों पर विचार करना चाहिए।
धारा90 बी0एन0एस0एस0 का महत्व
धारा 90 BNSS का महत्व इस बात में निहित है कि यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी और सक्षम बनाती है। यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति कानून की पकड़ से बच न सके और न्यायालय के आदेशों का पालन अनिवार्य रूप से किया जाए। साथ ही, यह न्यायालय को यह अधिकार भी देती है कि वह समय की बर्बादी और अनावश्यक विलंब को रोके, जो अक्सर तब होता है जब आरोपी या अन्य व्यक्ति जानबूझकर अदालत में उपस्थित नहीं होते। इस प्रकार, यह धारा न्यायिक प्रक्रिया की गति को बनाए रखने और न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने में सहायक होती है।
तुलना बी0एन0एस0एस0 / सी0आर0पी0सी0
हम इसे पुराने कानून से तुलना करें, तो यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 87 में मौजूद था, जिसे अब BNSS में धारा 90 के रूप में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य और स्वरूप लगभग समान है, केवल भाषा और संरचना में कुछ परिवर्तन किए गए हैं ताकि इसे अधिक स्पष्ट और आधुनिक बनाया जा सके।
धारा 90 सरल शब्दों में
यह कहा जा सकता है कि धारा 90 BNSS एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह आवश्यक परिस्थितियों में समन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त वारंट जारी कर सके। यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति न्याय से बच न सके। हालांकि, इस शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी, संतुलन और न्यायसंगत तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो और न्याय का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा सके।
धारा 75 और धारा 90 का क्या संबंध है ?
धारा 75 BNSS और धारा 90 BNSS आपस में सीधे तौर पर समन (Summons) और वारंट (Warrant) की प्रक्रिया के माध्यम से जुड़ी हुई हैं। दोनों धाराएँ मिलकर यह तय करती हैं कि किसी व्यक्ति को अदालत में कैसे बुलाया जाए और कब सख्त कदम उठाया जाए।
महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
1. धारा 75 BNSS क्या है?
धारा 75 BNSS समन (Summons) की तामील से संबंधित है। यह बताती है कि समन को व्यक्ति तक कैसे और किन तरीकों से पहुँचाया जाएगा ताकि उसे अदालत में उपस्थित होने की सूचना मिल सके।2. धारा 90 BNSS क्या है?
धारा 90 BNSS के तहत न्यायालय समन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त वारंट (Warrant) जारी कर सकता है, यदि उसे लगता है कि व्यक्ति समन के बावजूद उपस्थित नहीं होगा।
3. धारा 75 और धारा 90 में क्या अंतर है?
धारा 75 समन भेजने और उसकी तामील की प्रक्रिया बताती है, जबकि धारा 90 समन के असफल होने पर वारंट जारी करने का प्रावधान करती है।4. क्या बिना समन के सीधे वारंट जारी किया जा सकता है?
हाँ, यदि न्यायालय को लगता है कि व्यक्ति के फरार होने की संभावना है या मामला गंभीर है, तो वह सीधे वारंट जारी कर सकता है।5. वारंट कितने प्रकार के होते हैं?
मुख्य रूप से दो प्रकार के वारंट होते हैं—जमानती वारंट (Bailable Warrant),गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant)

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