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मुस्लिम लॉ / मुस्लिम विधि

 मुस्लिम कानून या 'शरिया' मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। भारत में, मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत मुसलमानों के व्यक्तिगत मामले जैसे निकाह, तलाक, और उत्तराधिकार संचालित होते हैं।
मुस्लिम लॉ / मुस्लिम विधि
मुस्लिम विधि के मुख्य स्तंभ निम्न प्रकार हैं । जो नीचे दिये गये हैं।👇

1. मुस्लिम विधि के स्रोत

मुस्लिम कानून को दो प्रमुख भागों में बांटा गया है:
 i. कुरान: सर्वोच्च स्रोत, जो अल्लाह का संदेश माना जाता है।
a.सुन्नत/हदीस: पैगंबर मोहम्मद साहब के कथन और उनके जीवन के उदाहरण हैं।
b. इज्मा: किसी कानूनी मुद्दे पर मुस्लिम विद्वानों की सर्वसम्मति।
c.कयास: तर्क और सादृश्य के आधार पर कानून की व्याख्या।

ii. न्यायिक निर्णयः- विधायन और न्याय व साम्य । मुस्लिम विधि में निकाह एक दीवानी अनुबंध  है, न कि संस्कार। इसकी  कुछ शर्तें अनिवार्य हैं।
 

मुस्लिम विधि में निकाह क्या हैः-

 i. प्रस्ताव और स्वीकृति : एक पक्ष प्रस्ताव देता है और दूसरा उसे स्वीकार करता है।
 ii. मेहर : यह वह धन या संपत्ति है जो पति, पत्नी को सम्मान स्वरूप देने के लिए बाध्य है।
 iii. गवाह: सुन्नी कानून में दो गवाहों का होना अनिवार्य है।

3. विवाह विच्छेदनः-
तलाक के कई तरीके हैं, जिन्हें आम तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
 i. न्यायेतर : जो अदालत के बाहर होता है जैसे तलाक-ए-अहसन, खुला, मुबारक।

नोट: 'तलाक-ए-बिद्दत' (एक साथ तीन तलाक) को भारत में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत अब अवैध और दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है।

पहले ऐसा होता था कि मुस्लिम पुरूष अपनी पत्नी को तीन वार तलाक बोलकर तलाक ले लेता था लेकिन मुस्लिम महिला विवाह संरक्षण अधिनियम 2019 में अब इसे अपराध घोषित कर दिया है । अब तलाक लेने के लिये न्यायालय कि प्रक्रिया अपनानी पडेगी ।

ii. न्यायिक : मुस्लिम विवाह विच्छेदन अधिनियम, 1939 के तहत एक मुस्लिम महिला अदालत के माध्यम से तलाक ले सकती है (जैसे क्रूरता या पति के लापता हो जाने पर )

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4. उत्तराधिकार और वसीयत

i. उत्तराधिकार: मुस्लिम कानून में जन्मसिद्ध अधिकार (जैसे हिंदू कानून में होता है) नहीं होता। उत्तराधिकार व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही शुरू होता है।
ii. वसीयत : एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति के केवल एक-तिहाई हिस्से की ही वसीयत कर सकता है, ताकि कानूनी उत्तराधिकारियों के हक की रक्षा हो सके ।

5. हिबा / उपहार
मुस्लिम कानून में 'दान' या 'उपहार' को 'हिबा' कहते हैं। इसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं:

1.दाता द्वारा घोषणा।
2.दाता द्वारा स्वीकारोक्ति।
3.संपत्ति का वास्तविक कब्जा सौंपना।

नोटः- भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ काफी हद तक संहिता बद्ध नहीं है, लेकिन समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और विशेष अधिनियमों जैसे 1986 का अधिनियम या 2019 का तीन तलाक कानून ने इसमें कई सुधार किए हैं।
मुस्लिम विधि में मेहर क्या है?

मुस्लिम विधि में मेहर  एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।
सरल शब्दों में, मेहर वह धन या संपत्ति है जिसे पति, विवाह/निकाह के समय या उसके बाद अपनी पत्नी को देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होता है। इसे अक्सर 'वधु मूल्य' समझ लिया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से यह पत्नी के प्रति सम्मान का प्रतीक और उसकी वित्तीय सुरक्षा का एक साधन है।

नोटः-

  •  मेहर निकाह का एक आवश्यक हिस्सा है। यदि निकाहनामे में मेहर का जिक्र नहीं भी है, तब भी कानूनन पति को मेहर देना पड़ता है।
  • यह पूरी तरह से पत्नी की संपत्ति होती है। वह इसे अपनी इच्छानुसार खर्च कर सकती है या निवेश कर सकती है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य तलाक या पति की मृत्यु की स्थिति में महिला को आर्थिक सहारा देना है।

मेहर को मुख्य रूप से भुगतान के समय के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है:

मुअज्जलः- यह वह राशि है जो निकाह के तुरंत बाद मांगने पर देय होती है। पत्नी इसे पाने तक पति के साथ रहने से मना कर सकती है।
मुवज्जल­­:- यह वह राशि है जो तलाक या पति की मृत्यु के समय देय होती है। हालांकि, इसे पहले भी आपसी सहमति से दिया जा सकता है।

नोटः- अगर मेहर की राशि निकाह के समय तय नहीं की गई है, तो उसे 'मेहर-ए-मिस्ल' कहा जाता है, जिसे महिला के परिवार की अन्य महिलाओं (जैसे उसकी बहनों या बुआ) को मिली मेहर के आधार पर अदालत तय करती है।

क्या पत्नी मेहर माफ कर सकती है?

हाँ, एक वयस्क और स्वस्थ दिमाग वाली पत्नी अपनी मर्जी से बिना किसी दबाव के मेहर की राशि को पूरी तरह या आंशिक रूप से माफ कर सकती है। इसे 'मेहर की छूट' कहा जाता है।
 
अगर पति मेहर देने से इनकार कर दे तब महिला के अधिकारः-
अगर पति मेहर देने से इनकार कर दे, तो भारतीय कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पत्नी को बहुत मजबूत अधिकार प्राप्त हैं। मेहर कोई खैरात नहीं, बल्कि एक कानूनी कर्ज  है।
यहाँ पत्नी के पास उपलब्ध कानूनी विकल्प और अधिकार दिए गए हैं:

1.साथ रहने से इनकार
यदि मेहर 'मुअज्जल'  है और पति उसे देने से मना करता है, तो पत्नी के पास अधिकार है कि वह पति के साथ रहने या शारीरिक संबंध बनाने से मना कर दे। अदालत भी पति को तब तक 'दांपत्य अधिकारों की बहाली' की डिक्री नहीं देगी जब तक वह मेहर नहीं चुका देता।
2.कानूनी मुकदमा
पत्नी मेहर की वसूली के लिए दीवानी अदालत (Civil Court) या फैमिली कोर्ट में मुकदमा दायर कर सकती है।
समय सीमा: आमतौर पर, निकाह के समय तय की गई मेहर के लिए दावा करने की समय सीमा 3 वर्ष होती है, जो मेहर मांगने और इनकार करने के समय से शुरू होती है।

3.संपत्ति पर कब्जे का अधिकार

:- यदि पति की मृत्यु हो जाती है और उसने मेहर नहीं चुकाई थी, तो पत्नी के पास पति की संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने का अधिकार है।
:-वह तब तक संपत्ति का कब्जा नहीं छोड़ेगी जब तक उसके मेहर का बकाया भुगतान नहीं हो जाता।ध्यान देने योग्य बातें : वह संपत्ति की 'मालिक' नहीं बनती, लेकिन उसे 'लेनदार' के रूप में तब तक कब्जा रखने का हक है जब तक उसका कर्ज चुकता न हो जाए।

4.विरासत में प्राथमिकता

पति की मृत्यु के बाद, उसकी संपत्ति का बंटवारा करने से पहले सभी कर्जों का भुगतान किया जाता है। मुस्लिम कानून में मेहर को प्राथमिकता दी जाती है। अन्य वारिसों (बच्चों, भाई-बहनों आदि) को हिस्सा तभी मिलेगा जब पत्नी की मेहर की पूरी राशि चुका दी जाएगी।

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5.तलाक के बाद भी हक

यदि पति तलाक देता है और मेहर बकाया है, तो उसे इद्दत की अवधि के दौरान या उससे पहले मेहर चुकाना अनिवार्य है। 1986 के अधिनियम के तहत, मजिस्ट्रेट पति को मेहर चुकाने का कड़ा आदेश दे सकता है।

महत्वपुर्ण तथ्य: यदि पत्नी मेहर माफ कर देती है, लेकिन बाद में यह साबित हो जाता है कि उसने यह 'दबाव' या 'भावनात्मक ब्लैकमेल' (जैसे मरते हुए पति की इच्छा पूरी करने के लिए) में किया था, तो अदालत उस माफी को रद्द कर सकती है और पति (या उसके वारिसों) को मेहर देने का आदेश दे सकती है।



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