Header Ads

SC/ST Act धारा 1 और 2: पूरी जानकारी, परिभाषाएँ और सरल व्याख्या

SC/ST Act धारा 1 और 2: नाम, विस्तार व परिभाषाओं की पूरी जानकारी (हिंदी में)

SC/ST Act धारा 1-2

धारा 1 - संक्षिप्त नाम विस्तार और प्रारम्भः

इस धारा में कानून के नाम, लागू क्षेत्र और लागू होने की तिथि के बारे में बताया गया है। इस धारा की मुख्य बातें:
इस कानून का नाम है:SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989,यह पूरे भारत में लागू होता है (पहले जम्मू-कश्मीर अलग था, लेकिन अब पूरे देश में लागू है),यह कानून केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करने के बाद लागू हुआ।
आसान भाषा में:
धारा 1 सिर्फ यह बताती है कि यह कानून क्या कहलाता है, कहाँ लागू होता है और कब से लागू हुआ।

धारा 2 SC/ST Act – परिभाषाएँ (Case Law सहित)

धारा 2 इस अधिनियम की आधारभूत धारा है, क्योंकि यह उन सभी शब्दों को परिभाषित करती है जिनके आधार पर पूरे अधिनियम का संचालन होता है। न्यायालयों ने भी कई मामलों में इन परिभाषाओं की व्याख्या करते हुए अधिनियम के उद्देश्य—यानी SC/ST वर्ग के संरक्षण—को प्राथमिकता दी है।
 एकल गवाह FIR देरी और स्टर्लिंग गवाह पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय - click here

1.(क) “अत्याचार”

“अत्याचार” से आशय धारा 3 के अंतर्गत दंडनीय अपराधों से है।
सुप्रीम कोर्ट ने Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra (2018) में कहा कि—इस अधिनियम का उद्देश्य निर्दोष व्यक्तियों को फँसाना नहीं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों की रक्षा करना है।
हालाँकि बाद में Prathvi Raj Chauhan v. Union of India (2020) में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—अधिनियम का संरक्षण कमजोर वर्गों के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसे कमजोर नहीं किया जा सकता।

(ख) “संहिता” (CrPC) – 

यहाँ “संहिता” का अर्थ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 है। State of M.P. v. Ram Krishna Balothia (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा—SC/ST Act एक विशेष कानून है, इसलिए यह CrPC के सामान्य प्रावधानों पर वरीयता रखता है, विशेषकर अग्रिम जमानत (anticipatory bail) के मामलों में।

(खख) “आश्रित” – 

अदालतों ने माना है कि “आश्रित” की व्याख्या व्यापक होनी चाहिए ताकि पीड़ित के परिवार को भी मुआवजा और संरक्षण मिल सके।

(खग) “आर्थिक बहिष्कार” –

Swaran Singh v. State (2008) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा—किसी SC/ST व्यक्ति को सामाजिक या आर्थिक रूप से अलग करना भी अत्याचार की श्रेणी में आ सकता है यदि यह उसकी गरिमा को प्रभावित करता है।

(खघ) “अनन्य विशेष न्यायालय” –

Gangula Ashok v. State of A.P. (2000) में कहा गया—विशेष न्यायालय का गठन इस उद्देश्य से किया गया है कि मामलों का त्वरित निपटारा हो और न्याय में देरी न हो।

(खङ) “वन अधिकार” – 

यह परिभाषा वन अधिकार अधिनियम, 2006 से ली गई है, और न्यायालयों ने इसे जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा के रूप में स्वीकार किया है।

(खच) “हाथ से मैला उठाने वाले कर्मी”

यह परिभाषा हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों का नियोजन प्रतिषेध अधिनियम, 2013 के अनुसार है, और न्यायालयों ने इसे मानव गरिमा से जोड़ा है।

(खछ) “लोक सेवक” –

State of Karnataka v. Appa Balu Ingale (1995) में कहा गया—यदि कोई लोक सेवक SC/ST व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

(ग) “SC/ST की परिभाषा” – 

E.V. Chinnaiah v. State of Andhra Pradesh (2005) में कहा गया—SC/ST की पहचान संविधान द्वारा निर्धारित है, और इसमें राज्य मनमाने ढंग से बदलाव नहीं कर सकता।

(घ) “विशेष न्यायालय” –

Gangula Ashok v. State of A.P. (2000) में स्पष्ट किया गया—केवल वही न्यायालय जो अधिनियम के तहत नामित है, वह इन मामलों की सुनवाई कर सकता है।

मुस्लिम लॉ / मुस्लिम विधि-click here

(ङ) “विशेष लोक अभियोजक” – 

न्यायालयों ने कहा है कि अभियोजक का अनुभव और योग्यता महत्वपूर्ण है ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके।

(डख) “सामाजिक बहिष्कार” –

Swaran Singh v. State (2008) में यह माना गया—सामाजिक बहिष्कार, व्यक्ति की गरिमा पर हमला है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

(ङग) “पीड़ित” – 

National Legal Services Authority v. Union of India (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा—“पीड़ित” की व्याख्या व्यापक होनी चाहिए ताकि उसे पूर्ण न्याय और पुनर्वास मिल सके।

(डघ) “साक्षी” – 

State of U.P. v. Ramesh Prasad Misra (1996) में कहा गया—साक्षी की विश्वसनीयता न्याय का आधार है और उसे संरक्षण मिलना चाहिए।

(च) अन्य शब्दों का अर्थ

जो शब्द यहाँ परिभाषित नहीं हैं, उनका अर्थ निम्न कानूनों से लिया जाएगा—भारतीय दंड संहिता, 1860,भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872,दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 ।

2. sc/st act में किसी अधिनियमिति या उसके किसी उपबंध के प्रति किसी निर्देश का अर्थ किसी ऐसे क्षेत्र  के संबंध में जिसमें ऐसी अनियमिति या ऐसा उपबंध प्रबृत्त नहीं है यह लगाया जायेगा कि बह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि ,यदि कोई हो के प्रति निर्देश है ।
आसान भाषा में-यदि कोई कानून किसी क्षेत्र में लागू नहीं है, तो वहाँ के स्थानीय कानून को मान्यता दी जाएगी।
Powered by Blogger.