Header Ads

शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा

 


शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा (Right of Private Defence)

भारतीय न्याय संहिता की धारा 35 हमें शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार देती है।

शरीर एवं सम्पत्ति की निजि प्रतिरक्षा के अधिकार कि नियम व शर्तें 

शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर तथा किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार तब लागू होता है जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध हमला (assault) किया जा रहा हो या उसे हत्या, गंभीर चोट, बलात्कार, अपहरण अथवा अन्य गंभीर अपराधों का वास्तविक और तात्कालिक खतरा हो। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को यह अनुमति होती है कि वह हमलावर के विरुद्ध उचित बल का प्रयोग कर सके।

उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य पर चाकू से हमला करता है और उसकी जान को खतरा उत्पन्न हो जाता है, तो पीड़ित व्यक्ति या कोई अन्य व्यक्ति उसकी रक्षा में हमलावर को चोट पहुँचा सकता है, और यदि परिस्थितियाँ अत्यधिक गंभीर हों, तो हमलावर की मृत्यु तक का कारण बनना भी कानून के अंतर्गत उचित ठहराया जा सकता है। इस प्रकार, शरीर की निजी प्रतिरक्षा व्यक्ति के जीवन और शारीरिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।

समन के स्थान पर वारंट कब जारी होता है-click here

आपराधिक न्याय प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सिद्धांत है, जिसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 में स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है। इस सिद्धांत का मूल उद्देश्य व्यक्ति को यह अधिकार प्रदान करना है कि जब उसके शरीर, जीवन या संपत्ति पर कोई अवैध और तत्काल खतरा उत्पन्न हो, तब वह अपनी रक्षा स्वयं कर सके। यह अधिकार इस विचारधारा पर आधारित है कि राज्य या कानून हर समय हर स्थान पर उपस्थित नहीं हो सकता, इसलिए व्यक्ति को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक और उचित बल प्रयोग करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। निजी प्रतिरक्षा का अधिकार केवल आत्म-सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूसरों की रक्षा करने का अधिकार भी प्रदान करता है, जिससे समाज में सहयोग और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा मिलता है।

संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा व्यक्ति को अपनी चल और अचल  संपत्ति की रक्षा करने का अधिकार प्रदान करती है।

यह अधिकार चोरी, लूट, डकैती, घर में अवैध प्रवेश या अन्य संपत्ति से संबंधित अपराधों के विरुद्ध प्रयोग किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी के घर में जबरन प्रवेश करता है या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता है, तो संपत्ति का स्वामी या कोई अन्य व्यक्ति उस अपराध को रोकने के लिए आवश्यक बल का प्रयोग कर सकता है।

धारा 80 सी0पीसी0 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को सरकार या किसी सरकारी अधिकारी को नोटिस कैसे लिखते है ।और क्यों लिखते हैं ।-click here

उदाहरण

यदि कोई चोर रात के समय घर में घुसकर सामान चुराने का प्रयास करता है, तो घर का मालिक उसे पकड़ने या रोकने के लिए बल प्रयोग कर सकता है। हालांकि, यहाँ भी यह आवश्यक है कि बल का प्रयोग परिस्थितियों के अनुसार उचित और सीमित हो, ताकि यह अधिकार दुरुपयोग का साधन न बन जाए।

निजी प्रतिरक्षा के अधिकार की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ  हैं, जो इसे अन्य कानूनी अधिकारों से अलग बनाती हैं।

1.तत्काल खतरे का होना

इसका अर्थ है कि खतरा वास्तविक और तात्कालिक होना चाहिए, केवल आशंका या भविष्य में होने वाली संभावना के आधार पर निजी प्रतिरक्षा का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

2.उचित बल का प्रयोग

व्यक्ति को केवल उतना ही बल प्रयोग करने की अनुमति है, जितना उस खतरे को रोकने के लिए आवश्यक हो। यदि कोई व्यक्ति मामूली खतरे के जवाब में अत्यधिक बल का प्रयोग करता है, तो उसका कार्य निजी प्रतिरक्षा के दायरे से बाहर हो सकता है।

3.सद्भावना (good faith)

व्यक्ति का उद्देश्य केवल अपनी या दूसरों की रक्षा करना होना चाहिए, न कि बदला लेना या आक्रामकता दिखाना।

हालांकि निजी प्रतिरक्षा का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ (limitations) निर्धारित की गई हैं, ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। सबसे पहले, यह अधिकार असीमित नहीं है और इसका प्रयोग केवल तब तक किया जा सकता है जब तक खतरा मौजूद हो। जैसे ही खतरा समाप्त हो जाता है, उसके बाद किया गया कोई भी हमला अवैध माना जाएगा। दूसरी सीमा यह है कि यदि किसी स्थिति में सरकारी सहायता, जैसे पुलिस, तुरंत उपलब्ध हो सकती है, तो व्यक्ति को अत्यधिक बल प्रयोग करने से बचना चाहिए। तीसरी महत्वपूर्ण सीमा यह है कि निजी प्रतिरक्षा का अधिकार बदले (revenge) के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति बदले की भावना से हमला करता है, तो वह निजी प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकता।

शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार में कब घातक बल का प्रयोग उचित ठहराया जा सकता है ?

कुछ विशेष परिस्थितियों में कानून व्यक्ति को यह अनुमति देता है कि वह हमलावर की मृत्यु तक का कारण बन सकता है। ऐसी परिस्थितियाँ अत्यंत गंभीर होती हैं, जैसे कि जब किसी व्यक्ति पर हत्या का प्रयास किया जा रहा हो, बलात्कार का प्रयास हो, अपहरण किया जा रहा हो, या गंभीर चोट पहुँचाने का खतरा हो। इन स्थितियों में व्यक्ति की सुरक्षा सर्वोपरि होती है, और कानून उसे पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है। इसी प्रकार, संपत्ति की रक्षा के मामले में भी, यदि डकैती या घर में खतरनाक तरीके से घुसपैठ की जा रही हो, तो आवश्यक परिस्थितियों में घातक बल का प्रयोग उचित ठहराया जा सकता है।

 vidhiguide 

 
Powered by Blogger.