हिन्दु विवाह अधिनियम 1955 क्या है ?

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955  जो हिंदुओं के विवाह, तलाक, पुनर्विवाह, भरण-पोषण और वैवाहिक अधिकारों से संबंधित नियमों को निर्धारित करता है।



जानते हैं इस अधिनियम के बारे मेंः-

यह अधिनियम उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो हिंदू धर्म के अनुयायी हैं इसमें बौद्ध, जैन और सिख धर्म के लोग भी इसमें शामिल हैं ।

इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य विवाह की वैधता तय करना,पति-पत्नी के अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करना, तलाक और न्यायिक पृथक्करण के नियम बताना, भरण-पोषण  और गुजारा भत्ता सुनिश्चित करना है ।

 सरल शब्दों में अगर कहें तो-

यह कानून हिंदू समाज में शादी और उससे जुड़े सभी कानूनी मामलों को नियंत्रित करता है, ताकि पति-पत्नी के अधिकार सुरक्षित रहें और विवाद होने पर न्याय मिल सके।


महत्वपूर्ण धाराएंः-

धारा 5 – विवाह की शर्तें

धारा 7 – विवाह की विधि

धारा 8 – विवाह का पंजीकरण

 धारा 9 – सहवास पुनर्स्थापन

धारा 10 – न्यायिक पृथक्करण

धारा 11 – शून्य विवाह (Void Marriage)

धारा 12 – शून्ययोग्य विवाह (Voidable Marriage)

धारा 13 – तलाक

धारा 13B – आपसी सहमति से तलाक

धारा 14 – 1 वर्ष से पहले तलाक नहीं

धारा 15 – पुनर्विवाह

धारा 16 – बच्चों की वैधता

धारा 24 – अंतरिम भरण-पोषण

धारा 25 – स्थायी भरण-पोषण


जानते हैं इन धाराओं के बारे में ः-

धारा 5 – विवाह की शर्तेंः-

धारा 5 वह नियम है जो बताता है कि एक  हिन्दु विवाह कब कानूनी रूप से  वैध माना जायेगा  । 

विवाह कि शर्तें निम्न प्रकार हैं।

एक पत्नी/पतिः

विवाह के समय किसी भी पक्ष का पहले से जीवित पति/पत्नी नहीं होना चाहिए यानी दूसरी शादी अवैध है ।


मानसिक स्थिति ः

दोनों पक्ष मानसिक रूप से स्वस्थ हों पागलपन या असमर्थता नहीं होनी चाहिए


न्यूनतम आयु ः

लड़का: 21 वर्ष ,लड़की: 18 वर्ष ।


निषिद्ध संबंध ः

पति-पत्नी आपस में नजदीकी रिश्तेदार (जैसे भाई-बहन) नहीं होने चाहिए ।


सपिंडा संबंध ः

दोनों सपिंड संबंध में नहीं होने चाहिए (खून के बहुत नजदीकी रिश्ते)।


धारा 7 – विवाह की विधि ः

हिंदू विवाह में अग्नि के सामने सात फेरे लेना ,दक्षिण भारत में अलग रीति (जैसे मंगलसूत्र बांधना) ।


धारा 8 – विवाह का पंजीकरण ः

धारा 8 के अनुसार राज्य सरकार विवाह के पंजीकरण के लिए नियम बना सकती है, जिससे विवाह का कानूनी प्रमाण प्राप्त होता है।


धारा 9 – सहवास पुनर्स्थापनः

धारा 9 के अनुसार यदि पति या पत्नी बिना उचित कारण के अलग हो जाए, तो दूसरा पक्ष कोर्ट से सहवास पुनर्स्थापन  की मांग कर सकता है।


धारा 10 – न्यायिक पृथक्करणः

पति या पत्नी में से कोई भी कोर्ट में याचिका देकर अलग रहने ( की अनुमति ले सकता है, बिना विवाह को खत्म किए।


धारा 11 – शून्य विवाहः

यदि कोई विवाह कानून की मूल शर्तों  धारा 5  का उल्लंघन करता है, तो वह विवाह शून्य (Void) माना जाता है।

धारा 12 – शून्ययोग्य विवाहः

शादी पहले से वैध मानी जाती है, लेकिन अगर कोई समस्या हो तो कोर्ट उसे बाद में खत्म कर सकती है ।



धारा 13 – तलाकः

पति या पत्नी में से कोई भी कोर्ट में याचिका देकर तलाक ले सकता है, अगर कुछ कानूनी आधार  मौजूद हों।


धारा 13B – आपसी सहमति से तलाकः

अगर दोनों पति-पत्नी सहमत हों तो आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं ।


धारा 14 – 1 वर्ष से पहले तलाक नहींः

शादी के तुरंत बाद तलाक नहीं लिया जा सकता, कम से कम 1 साल का इंतजार जरूरी है।


धारा 15 – पुनर्विवाहः

जब किसी पति या पत्नी का तलाक  हो जाता है, तो वे दोबारा विवाह  कर सकते हैं।


धारा 16 – बच्चों की वैधताः

धारा 16 के अनुसार, शून्य या शून्ययोग्य विवाह से जन्मे बच्चे भी वैध माने जाते हैं, लेकिन उन्हें पैतृक संपत्ति में पूर्ण अधिकार नहीं मिलता ।


धारा 24 – अंतरिम भरण-पोषणः

केस चलने के दौरान, जो पति या पत्नी कमजोर आर्थिक स्थिति में है, वह दूसरे से खर्चा मांग सकता है।


धारा 25 – स्थायी भरण-पोषणः

कोर्ट किसी भी वैवाहिक मामले (तलाक, न्यायिक पृथक्करण आदि) के बाद पति या पत्नी में से किसी एक को स्थायी भरण-पोषण  दिला सकती है।


क्या आप हिन्दु विधि की सभी धाराओं को गहराई से समझना चाहते हैं ?




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